Friday, September 14, 2018

नज़रियाः बीजेपी को असम की नहीं, आम चुनाव की चिंता?

रतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित कुमार शाह को एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण से नया उत्साह मिल गया है.
वे हुँकारा भरते हुए कहते फिर रहे हैं कि "विदेशी नागरिकों को चुन-चुनकर निकालूँगा." उन्हें हिंदू ध्रुवीकरण का नया मंत्र मिल गया है और अब वे इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुट गए हैं.
और अमित शाह ही क्यों, तमाम बीजेपी नेताओं ने इसे नए जुमले की तरह दोहराना शुरू कर दिया है. उन्हें लग रहा है कि राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा की छौंक लगाकर इस विवाद को चुनावों में भुनाया जा सकता है.
धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने की इसमें उन्हें अच्छी-खासी गुंज़ाइश दिखाई दे रही है इसलिए उन्होंने इसे तपाना शुरू कर दिया है.
विदेशी घुसपैठ के मुद्दे को बीजेपी असम में काफ़ी अरसे से भुनाने की कोशिश करती आ रही है और उसे इसमें सफलता भी मिली है.
एनआरसी के रूप में उसके भाग्य से छींका भी टूट गया और अब अमित शाह चालीस लाख विदेशियों का विवादित आँकड़ा बताकर चुनावी अभियान पर निकल पड़े हैं.
हालाँकि राष्ट्रीय नेतृत्व के रुख़ के विपरीत असम में बीजेपी एनआरसी के सवाल पर धर्मसंकट में फँसी हुई है. वह अमित शाह की तरह आक्रामक नहीं हो पा रही. इसकी वज़ह भी साफ़ है. एनआरसी की अंतिम सूची में केवल मुसलमानों के ही नाम नहीं हैं. उसमें बड़ी तादाद में हिंदू भी शामिल हैं.
और तो और अंतिम सूची के हिसाब से उसके कई नेताओं या उनके परिजनों की नागरिकता भी ख़तरे में है. उसके विधायक रमाकांत देउरी और उनके परिजनों के नाम सूची में नहीं है.
इसके अलावा जनजातियों और गोरखा लोगों की तादाद भी अच्छी ख़ासी है. हिंदू जनजाति नामशूद्र के ही छह लाख लोगों के नाम सूची में नहीं हैं. वे पचास के दशक से बांग्लादेश से आकर बसते रहे हैं.
फिर चालीस लाख का आँकड़ा आगे जाकर कितना कम होगा इसका पता नहीं है. संभावना है कि इसमें उल्लेखनीय कमी आएगी.
ऐसी सूरत में विदेशी नागरिकों की संख्या के बारे में जो दावे वह करती रही है उसकी हवा भी निकल सकती है.
ज़ाहिर है कि ऐसे में असम बीजेपी एनआरसी के बल पर उछल-कूद नहीं कर सकती और करेगी तो उसे स्थानीय लोगों की नाराज़गी का सामना करना पड़ेगा.
इस समस्या से निपटने के लिए बीजेपी ने नागरिकता क़ानून में संशोधन करने का पाँसा फेंका है. संशोधन करके वह घुसपैठ करने वाले विदेशी हिंदुओं को नागरिकता देने की फिराक में है. मगर उसके सहयोगी दल ही विरोध कर रहे हैं.
असम गण परिषद जैसे दल घुसपैठियों के सवाल को धार्मिक आधार पर नहीं देखते. वे चाहते हैं कि विदेशी चाहे हिंदू हों या मुसलमान, उसे वापस भेजा जाना चाहिए.
ऐसे मे अगर बीजेपी ज़बरदस्ती करेगी तो वे सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं. यहां तक कि असम बीजेपी में भी फूट पड़ सकती है.
लेकिन बीजेपी हाईकमान शायद ही इसकी चिंता करेगा. राष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाले राजनीतिक फ़ायदे की तुलना में वह असम की कुछ लोकसभा सीटें खुशी-खुशी कुर्बान करने को तैयार हो जाएगी.
यही वह रणनीति है जिसके तहत अमित शाह कह रहे हैं कि अगर 2019 में बीजेपी जीतकर आई तो पूरे देश में एनआरसी लागू करवाएगी.
अमित शाह का अगला निशाना पश्चिम बंगाल है. बंगाल में भी मुसलमानों की अच्छी तादाद है. बांग्लादेश से लगे होने की वजह से हो सकता है यहाँ भी घुसपैठी मिल जाएं.
कैलाश विजयवर्गीय तो घोषणा ही कर चुके हैं कि उनका अगला निशाना बंगाल है.
इसी की जवाबी प्रतिक्रिया में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने कहा था कि अगर ऐसा हुआ तो ख़ून की नदियाँ बह जाएंगी और गृह युद्ध हो जाएगा. लेकिन शायद बीजेपी को ममता की ये मुद्रा माफ़िक बैठती है. इस स्थिति में वह अव्वल तो मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरेगी और आगे चलकर सत्ता पर उसकी दावेदारी भी बढ़ जाएगी.

Thursday, September 6, 2018

英国要求福克兰群岛附近海域的主权

路透社报导英国要求接近福克兰群岛的南大西洋海底大区块的主权。这项举动引发英国与阿根廷之间对于可观的石油天然气蕴藏掌控权的外交争夺。上个月阿根廷针对大陆架的界线向联合国委员会提出他们自己的要求。

两个国家之间长期以来对于福克兰群岛主权(阿根廷称之为马尔维纳斯群岛)争执不下。此争论引发1982年的战争,冲突可能因矿产权的争夺而加剧。

英国此项宣示涵盖近福克兰群岛、南乔治亚岛和南桑德韦奇岛约一百二十万平方公里的面积。根据联合国海洋法公约,临海国家可开发距岸边至少两百海哩的大陆架天然资源。在特殊情况下可向外延伸达三百五十海哩。

联合国委员会正考虑超过四十项由多国提出希望扩张海底区域主权的要求。预计还有更多可能被提出。英国外交部官员向«路透社»表示,当国际间提出竞争性的要求,在各国解决争论以前,联合国委员会可能暂缓考虑其要求。
据《新科学家》杂志援引圣保罗大学的研究结果称,生物多样性热点巴西的大西洋雨林地区在过去的500年间不断萎缩,只剩下大约原本的1/10。圣保罗大学的科学家称,除非破坏能得以停止, 否则这个地区特有的猴类和鸟类就将濒临灭绝。

覆盖面积约达到150万平方千米的大西洋雨林孕育着2万多种植物,260多种动物,700余种鸟类,200余种爬行动物,280种两栖动物以及数百种尚未命名的生物。科学家更称,亚马逊雨林的持续退化使得巴西大西洋雨林的困境状态变得朦胧。

不幸的是,大西洋雨林的状况实际上已经非常糟糕,”科学家让保罗梅茨格说,“生物绝种速度将会加快,并且因为有30%的生物物种是该地区独有的,那么也就是说它们将会永远地消失。”

梅茨格的同事米尔顿里贝罗用卫星图像和植被图绘制了这整个区域的地图。他发现现存雨林中的80%被分裂成了小于0.5平方千米的小块,而每小部分之间的距离平均有1.4千米,这就使得动物们很难从其中一处迁移到另一处。另外,现存雨林中只有14%是被保护的,因为有70%的巴西人口现在就居住在曾经还是大西洋雨林的区域,这其中包括圣保罗和里约热内卢。

目前首要的就是保护海岸山脉沿岸靠近圣保罗的大片幸存雨林,并且修复雨林中各个小部分的连接以便于动物迁徙。一些濒临灭绝的灵长目动物,比如金狮绢毛猴和北部绒毛蜘蛛猴就栖息在这片区域中。科学»学刊报导,根据美国研究,与其转成乙醇注入汽车燃料箱,由作物转换为电力的生质燃料效益更佳。此项研究发现由谷物中取得的乙醇和倾草一旦转换成电力可使汽车跑得更远,排放较少量的温室气体。
尽管生质燃料在燃烧時会释放二氧化碳,等量的二氧化碳在下一批作物成长时會被再度吸收。因此生质燃料被广泛认为是比起石化燃料对环境更好的替代燃料。然而,一般还未充分了解的是究竟将作物转换为乙醇于传统内燃机中燃烧较佳,或燃烧作物产生电力驱动节能车较佳。

加州大学环境工程师艾略特.坎贝尔、墨西及其同僚实行了生化乙醇和生化电力科技的生命周期评估。他们比较在产制汽车和燃料过程中消耗的能源以及由生化乙醇及生化电力产生的能源后发现生化电力明显胜出。此团队指出由生质燃料转换的电力驱动的汽车跑得更远,多出百分之八十一。

坎贝尔指出使用作物产生电力驱动一台节能车将比生化乙醇驱动的车子释放更少的二氧化碳。电力引擎比起内燃机效率更高。他向«科学»学刊表示“即使是最佳的乙醇产制科技与节能技术仍不及使用作物产生的电力”。

然而,不同类型引擎的成本差异及可能产生的环境效应,包括空气污染和用水并未列在评估当中。

Tuesday, September 4, 2018

दलितों के खिलाफ हिंसा के 3 मामले जो बताते हैं 'कास्ट-फ्री इंडिया' कितना बड़ा झूठ है

रियाणा का मिर्चपुर. हरियाणा के हिसार में एक कस्बा. 24 अगस्त, 2018 को देश भर में ये नाम न्यूज़ चैनलों पर गूंज रहा था. तारीफ में नहीं. इसलिए कि यहां 7 साल पहले एक दलित बाप-बेटी को ज़िंदा जला दिया था. इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया है. कुल 33 लोगों को सज़ा हुई है. पहले से सज़ा पाए 13 लोगों की सज़ा बरकार रखी गई है, कुछ की बढ़ी भी है. इनमें से 12 लोगों को उम्रकैद की सज़ा हुई है.

आपका कोई न कोई ऐसा दोस्त ज़रूर होगा, जो आपसे कहता होगा कि ये कास्ट-वास्ट सब बीते दिनों की बातें हैं. पहले होता था, अब नहीं होता. अब जो मेहनत करता है, आगे बढ़ जाता है. मेरिट का ज़माना है. हमारा सुझाव है कि अपने उन दोस्तों को आप मिर्चपुर कांड की पूरी कहानी सुना सकते हैं. ये कहानी आपको इस लिंक पर मिल जाएगी. इसमें आपको उन सारी बातों का ज़िक्र मिलेगा जो अपके दोस्त को लगता होगा कि पुराने किसी युग में होती होंगी. मसलन ”ऊंची” जाति वाले मर्दों का उन औरतों को छेड़ना, जिन्हें वो ”छोटी”
जाति का मानते हैं. या फिर कुत्ते के भौंकने जितनी छोटी बात पर पूरी प्लानिंग के साथ अगड़ी जाति के लोगों की भीड़ का दलितों की बस्ती को आग लगा देना. ये जानते हुए कि एक घर में पोलियो ग्रसित लड़की और उसके पिता बंद हैं.
अगर आपका (या आपकी) दोस्त कहे कि ये एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है. लेकिन एक एक्सेप्शन है, तो आप उसे हरियाणा के ही तीन बड़े कांड बता सकते हैं. सारे दलितों के खिलाफ हिंसा के. और सभी कमोबेश एक ही पैटर्न पर.
दुलीना कांड
15 अक्टूबर 2002 को दशहरे की शाम झज्जर में कुछ लोगों को सड़क पर मरी गायें नज़र आईं. इन लोगों ने 5 दलित लड़कों को पकड़ा और दुलीना पुलिस पोस्ट ले गए. इनमें से तीन लड़के चमड़े का काम करते थे. लड़कों को पुलिस के पास ले जाने वाले लोगों का कहना था कि ये लड़के गुड़गांव – झज्जर रोड पर गोकशी करते पकड़े गए थे. अभी शाम के सवा छह बज रहे थे.
गोकशी की बात सुनते ही दुलीना पुलिस पोस्ट के बाहर लोग जुटने लगे. नारेबाज़ी करने लगे. कुछ लोग भीड़ को उकसा रहे थे और तनाव बढ़ रहा था. लेकिन पुलिस ने भीड़ पर काबू करने में गज़ब की लापरवाही दिखाई. रात 8 बजकर 43 मिनिट पर जाकर झज्जर पुलिस लाइन्स से अतिरिक्त पुलिस मांगी गई. हर बीतते पल के साथ भीड़ में गुस्सा बढ़ रहा था. रात 9 बजकर 45 मिनिट पर भीड़ काबू के बाहर हो गई और इन लड़कों को पुलिस पोस्ट से बाहर निकाल लिया गया.
पुलिस प्रशासन की आंखों के सामने भीड़ इन लड़कों को पीटने लगी. उतने में किसी ने इन लड़कों की गाड़ी में आग लगा दी. पास के एक झोंपड़े को भी आग ने अपनी चपेट में ले लिया. दो दलितों को पीटकर इसी आग में फेंक दिया गया. बाकी तीन को भी इतना पीटा गया कि उनकी जान चली गई. रात सवा दस तक सभी पांच दलित लड़के मारे जा चुके थे. इसके बाद जाकर पुलिस लाइन से अतिरिक्त बल दुलीना पुलिस पोस्ट पहुंचा.
पुलिस ने भीड़ के खिलाफ तो मामला दर्ज किया, मरने वाले दलितों पर भी गोकशी की धाराएं लगा दीं. इंक्वायरी कमीशन के सामने इस पूरी घटना के चश्मदीद पुलिसवालों ने बयान दिया कि भीड़ को भड़काने में झज्जर गौशाला के चेयरमैन का हाथ था. लेकिन उनका नाम एफआईआर में लिखा ही नहीं गया. न उन 14 लोगों का नाम एफआईआर में आया जो लड़कों को पकड़कर पुलिस पोस्ट लाए थे और लिंचिंग के दौरान मौजूद थे.
9 अग्सत 2010 को मामले के 7 आरोपियों को उम्रकैद की सज़ा हुई. 19 आरोपी छूट गए. फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सभी आरोपी बेल पर हैं.

गस्त, 2005 को सोनीपत के गोहाना में वाल्मीकि लड़कों से मारपीट में एक जाट लड़के की मौत हो गई. इसी दिन पुलिस ने 7 वाल्मीकि लड़कों पर मामला दर्ज कर 4 को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन गुस्से से भरे जाटों ने 28 अगस्त को एक महापंचायत करके पुलिस को धमकी दे दी कि अगर 48 घंटों में सभी वाल्मीकि आरोपी गरफ्तार नहीं हुए तो वाल्मीकि बस्ती में आग लगा दी जाएगी.
29 अगस्त से वाल्मीकियों ने अपने घर छोड़ने शुरू कर दिए. इल्ज़ाम है कि पुलिस भी वाल्मीकियों को घर छोड़ने को कह रही थी. 30 तारीख तक तकरीबन 2000 वाल्मीकि घर छोड़ चुके थे.
नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स की आउटलुक मैगज़ीन में 5 सितंबर, 2005 को छपी रिपोर्ट के मुताबिक 31 अगस्त, 2005 को जाटों की एक और महापंचायत हुई. इसके बाद 1500 जाटों की एक भीड़ वाल्मीकि बस्ती की ओर बढ़ी. इनके पास पेट्रोल, केरोसीन और लाठी-डंडे थे.
इस भीड़ ने तकरीबन 200 पुलिस वालों की मौजूदगी में 4 घंटे तक उत्पात मचाया. पुलिस ने 12 राउंड हवाई फायर किए. लेकिन 50-60 वाल्मीकि घर आग में जलकर खाक हो गए. 2012 में इस मामले की सुनवाई करते हुए पंचकूला की सीबीआई अदालत ने सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया था. इस मामले में सोनीपत से भाजपा सांसद रहे किशन सिंह सांगवान का बेटा भी आरोपी था. फैसला आने से पहले 3 आरोपियों की मौत हो गई थी.
करनाल के पास पड़ता है सालवन. 26 फरवरी, 2007 को दो लड़के जानवर चराने निकले. जानवर एक खेत में जा घुसे. खेत का मालिक जब पहुंचा तो लड़कों और मालिक में विवाद हो गया. मारपीट भी हुई. जानवर चराने वाले लड़के प्रदीप और लीलू वाल्मीकि थे और खेत मालिक महिपाल था राजपूत. प्रदीप और लीलू वापस चले आए और अपने साथ और लोगों को लेकर दोबारा महिपाल के पास पहुंचे. इन्होंने महिपाल को इतना पीटा कि उसकी जान चली गई.
अगले दिन महिपाल के अंतिम संस्कार के बाद राजपूतों ने बड़ी चौपाल पर एक मीटिंग रखी. मीटिंग के बाद वाल्मीकि बस्ती को लूटपाट के बाद आग लगा दी गई. 25 वाल्मीकि घायल हुए जिनमें एक गंभीर था. 2 मार्च को एक वाल्मीकि लड़के की मौत हो गई. ये महिपाल को मारने के आरोपियों में से एक का रिश्तेदार था.
ये हरियाणा के तीन बड़े मामले हैं जिनमें दलितों के खिलाफ अत्याचार हुए. और इनका एक पैटर्न है. पहले दलितों और अगड़ी जातियों के बीच एक छोटा विवाद होता है. इसके बाद अगड़ी जातियों के लोग इकट्ठा होकर दलित बस्तियों पर पूरी प्लानिंग के साथ हमला करते हैं. इन तीन बड़े मामलों के अलावा हरियाणा में नियमित अंतराल पर दलियों और अगड़ी जातियों के बीच संघर्ष होता आया है. और इस संघर्ष के बाद दलित कुछ समय के लिए या फिर मिर्चपुर की तरह हमेशा के लिए विस्थापित हो जाते हैं.
अपने दोस्त को ये भी बताएं कि हरियाणा कोई पिछड़ा राज्य नहीं है. ये वही राज्य है जहां से खेलों में सबसे ज़्यादा मेडल आते हैं और ग्रोथ रेट (जिसमें ‘मेरिट’ भी बहुत काम आती है) के मामले में हरियाणा देश के औसत से कहीं आगे है. आप चाहें तो अपने दोस्त को ये भी बता सकते हैं कि हिंदुस्तान में हर 18 मिनिट में एक दलित के खिलाफ हिंसा होती है और दिन बीतते तक 2 दलितों की जान जा चुकी होती है.
इनते पर भी आपका दोस्त न माने तो आप हार मान लीजिएगा. किसी और को पकड़कर ये कहानियां सुनाइएगा. आप दो लोगों को हमारे मुल्क की असल स्थिति का अंदाज़ा दिला पाए तो काम बन जाएगा.