Tuesday, May 21, 2019

केदारनाथ: पीएम मोदी ने गुफा में ध्यान लगाया या 'होटल' में?

पाहवा और विष्णु करकरे पहले बिड़ला हाउस पहुंच गए थे. शेष को टैक्सी ड्राइवर सुरजीत सिंह लेकर आता है. सुरजीत सिंह बाद में सरकारी गवाह बन गए थे. मदन लाल पाहवा वहां पर एक फोटोग्राफऱ के रूप में पहुंचते हैं. धमाके के बाद उसके साथी वहां से निकल भागे.
बहरहाल, इतनी भयावह घटना के बाद क़ायदे से बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद किया जाना चाहिए था.
पर क्या इस बाबत कोई प्रयास हुए? अगर प्रयास किए गए होते तो बापू मारे नहीं जाते.
उधर, पहले प्रयास में कामयाबी ना मिलने के बावजूद गोडसे और आप्टे दस दिनों में दूसरी बार एयर इंडिया वाइकिंग विमान से बंमई से दिल्ली आते हैं.
ये दोनों 20 जनवरी के बाद बंबई चले गए थे. ज़ाहिर है कि पुलिस एक्शन के भय से इस बार ये मरीना होटल नहीं जाते.
अब इन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम ही सुरक्षित नज़र आ रहा था.
गोडसे ने नारायण आप्टे के साथ वेटिंग रूप में रात गुज़ारी. दिल्ली में 27 जनवरी को बापू के महरौली में सूफ़ी बख्तियार काकी की दरगाह में जाने की जानकारी मिलती है.
दरअसल काकी की दरगाह को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई थी. इससे बापू आहत थे. ये बापू के जीवन का कोई अंतिम कार्यक्रम था. ये मालूम चलने के बाद इनका ख़ून खौल उठता है.
तब विष्णु करकरे भी इनके साथ थे. इतिहासकार दिलीप सिमियन कहते हैं कि बापू के काकी की दरगाह में जाने के बाद तो इन्होंने तय कर लिया कि अब उन्हें जल्दी ही मार डाला जाए.
अब वह मनहूस 30 जनवरी का दिन आ जाता है. उस दिन इन्हें बापू की हत्या करनी है. बापू पर गोली नाथूराम गोडसे को चलानी थी. उधर से वे बिड़ला हाउस के लिए दूसरा तांगा लेते हैं.
बापू के अंतिम दिन के एक-एक पल का ख़ुलासा करने वाले पत्रकार स्टीफन मर्फी लिखते हैं, "20 जनवरी को हुए हमले के बाद बिड़ला हाउस में 30 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई थी. नेहरू और पटेल के इस आग्रह को बापू ने मान लिया था. पर जब उन पर गोडसे गोली चलाते हैं, तब उनके साथ रहने वाले सादी वर्दी वाला पुलिसकर्मी एपी भाटिया ग़ैर-हाज़िर होते हैं. उस दिन उनकी कहीं और ड्यूटी लगा दी जाती है. उनके स्थान पर बापू की सुरक्षा में कोई तैनात नहीं होता. बापू के संग रहने वाले गुरुबचन सिंह भी नहीं थे. वो बापू के अटैंडेंट का काम करते थे."
एक सवाल ये भी कि क्या तब बिड़ला हाउस के भीतर कोई भी मजे से प्रवेश पा सकता था? क्या उधर आने वालों की कोई छानबीन नहीं होती थी? मतलब ये कि जिन सुरक्षाकर्मियों को बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था का ज़िम्मा था, वे क्या कर रहे थे?
भाटिया की 30 जनवरी को किसने और क्यों किसी अन्य जगह पर ड्यूटी लगा दी थी? अब इन सवालों के जवाब कोई नहीं देगा?
हां, ये ठीक है कि 30 जनवरी, 1948 को चांदनी चौक इलाक़े में सफ़ाई कर्मी अपनी मांगों के समर्थन में बड़ा प्रदर्शन कर रहे थे. इसलिए काफ़ी सुरक्षा कर्मी वहां भेज दिए गए थे.
तो क्या भाटिया भी चांदनी चौक में ही थे? मतलब बापू को मरने के लिए अकेले छोड़ दिया गया था.
अफ़सोस तो ये देखिए कि बापू के साथ सुबह-शाम रहने वाली उनकी निजी चिकित्सक डॉक्टर सुशीला नैयर भी उस दिन नहीं थीं. वो पाकिस्तान गई हुई थीं.
पर उन्हें गोली मारे जाने के कुछ देर के बाद डॉक्टर डीपी भार्गव और डॉक्टर जीवाजी मेहता वहां पहुंच गए थे.
डॉक्टर मेहता ने बापू को मृत घोषित किया था. बापू की निर्विवाद रूप से महानतम जीवनी 'दि लाइफ़ ऑफ़ महात्मा गांधी' में लुई फिशर लिखते हैं, "नेहरू भी तुरंत बिड़ला हाउस पहुंच गए थे. वे बापू के ख़ून से लथपथ शरीर से लिपटकर रो रहे थे. फिर बापू के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी, शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी बिड़ला हाउस आ गए.
बहरहाल, गांधी जी की हत्याकांड के दो मुख्य अभियुक्तों और मित्रों गोडसे और आप्टे को फांसी की सज़ा दी गई. शेष को उम्र क़ैद मिली.

Monday, May 6, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

एक सवाल यह भी उठता है कि कांग्रेस को समर्थन देकर क्या सपा-बसपा का गठबंधन अंतिम के चरणों में उन जगहों पर फ़ायदा लेना चाहता है जहां कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं?
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "कांग्रेस ने पहले ही एक तरह से इशारा कर दिया है कि जहां हमारी जीतने की संभावना न हो, वहां गठबंधन के प्रत्याशी को वोट दें."
"एक तरह से यह प्री-पोल अंडरस्टैंडिंग है. कांग्रेस ने तमाम जगहों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे हैं, जो भाजपा का नुक़सान कर सकते हैं. कांग्रेस ने भाजपा के पटेल के ख़िलाफ़ पटेल उम्मीदवार या फिर ब्राह्मण के ख़िलाफ़ ब्राह्मण उम्मीदवार ही मैदान में उतारा है."
यह ऐसा इसलिए किया गया है ताकि भाजपा विरोधी वोट न बंटे और भाजपा को नुक़सान हो.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शनिवार को प्रतापगढ़ की रैली में कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा था कि "जो पार्टी पहले चरण के मतदान से पहले ख़ुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदार बता रही थी वो अब यह मानने लगी हैं कि हम तो उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ वोट काटने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. ये वोट कटाऊ पार्टी बन गई है."
इन दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने समाजवादी पार्टी की एक रैली में मंच साझा किया था. जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बसपा को सपा के हाथों ठगे जाने की बात कही.
नरेंद्र मोदी ने शनिवार को प्रतपागढ़ की रैली में कहा था कि "समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के बहाने बहन मायावती का तो फ़ायदा उठा लिया, चालाकी की, उनको अंधेरे में रखा, बड़े-बड़े मान-सम्मान की बातें की. आपको प्रधानमंत्री बना देंगे, ये भी कह दिया है."
"लेकिन अब बहन मायावती को यह समझ आ गया है कि ये सपा और कांग्रेस ने मिल कर बहुत बड़ा खेल खेला है. दूसरी तरफ़ कांग्रेस के नेता ख़ुशी-ख़ुशी समाजवादी पार्टी की रैलियों में मंच साझा कर रहे हैं. बहनजी को ऐसा धोखा इन लोगों ने दिया है कि उन्हें भी समझ नहीं रहा है."
इस पर पलटवार कहते हुए मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह बयान उनकी हताशा बताता है.
उन्होंने कहा, "भाजपा हमारे गठबंधन की दोनों पार्टियों के बीच फूट डालो और राज करो की नीति अपना रही है. बाक़ी के बचे चरणों के चुनाव में भाजपा अपनी कुछ इज़्ज़त बचा सके, इसलिए ये हताश नीति अपना रही हैं."
क्या वाक़ई भाजपा ने हताशा में ये बातें कही है, इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि जिस तरह का माहौल बन रहा है, उसमें भाजपा को अपना रास्ता स्पष्ट नहीं दिख रहा है.
वो कहते हैं कि भाजपा बसपा के वोटरों को यह संदेश देना चाहती है कि बहनजी के साथ ग़लत हो रहा है. अगर कल को भाजपा को सरकार बनाने के लिए बसपा के समर्थन की ज़रूरत पड़ती है तो वो आज से ही इसकी पृष्ठभूमि तैयार कर रही है.
नवीन जोशी कहते हैं, "चुनावों के बाद क्या गणित बनेगा, उसमें मायावती कहां जा सकती हैं, आज कहना मुश्किल है. मायावती का जिस तरह का व्यवहार रहा है, उसके आधार पर वो अचानक बदल भी सकती हैं."
भाजपा को यह संभावना दिखाई दी कि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन के मंच पर अगर प्रियंका गांधी पहुंच गई तो इसको एक हथियार बनाकर बसपा को सपा के ख़िलाफ़ भड़काया जाए और भविष्य में इसका फ़ायदा उठाया जाए.
मायावती पहले भी भाजपा के सहयोग से कई बार सरकार बना चुकी हैं. नवीन जोशी इसे पार्टी की सोची समझी रणनीति मानते हैं. हालांकि ये रणनीतियां कितनी काम आती हैं, यह 23 मई को परिणाम आने के बाद ही पता चल पाएगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)