पाहवा और विष्णु करकरे पहले बिड़ला हाउस पहुंच गए थे. शेष को टैक्सी
ड्राइवर सुरजीत सिंह लेकर आता है. सुरजीत सिंह बाद में सरकारी गवाह बन गए
थे. मदन लाल पाहवा वहां पर एक फोटोग्राफऱ के रूप में पहुंचते हैं. धमाके के बाद उसके साथी वहां से निकल भागे.
बहरहाल, इतनी भयावह घटना के बाद क़ायदे से बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद किया जाना चाहिए था.
पर क्या इस बाबत कोई प्रयास हुए? अगर प्रयास किए गए होते तो बापू मारे नहीं जाते.
उधर, पहले प्रयास में कामयाबी ना मिलने के बावजूद गोडसे और आप्टे दस दिनों में दूसरी बार एयर इंडिया वाइकिंग विमान से बंमई से दिल्ली आते हैं.
ये दोनों 20 जनवरी के बाद बंबई चले गए थे. ज़ाहिर है कि पुलिस एक्शन के भय से इस बार ये मरीना होटल नहीं जाते.
अब इन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम ही सुरक्षित नज़र आ रहा था.
गोडसे ने नारायण आप्टे के साथ वेटिंग रूप में रात गुज़ारी. दिल्ली में 27 जनवरी को बापू के महरौली में सूफ़ी बख्तियार काकी की दरगाह में जाने की जानकारी मिलती है.
दरअसल काकी की दरगाह को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई थी. इससे बापू आहत थे. ये बापू के जीवन का कोई अंतिम कार्यक्रम था. ये मालूम चलने के बाद इनका ख़ून खौल उठता है.
तब विष्णु करकरे भी इनके साथ थे. इतिहासकार दिलीप सिमियन कहते हैं कि बापू के काकी की दरगाह में जाने के बाद तो इन्होंने तय कर लिया कि अब उन्हें जल्दी ही मार डाला जाए.
अब वह मनहूस 30 जनवरी का दिन आ जाता है. उस दिन इन्हें बापू की हत्या करनी है. बापू पर गोली नाथूराम गोडसे को चलानी थी. उधर से वे बिड़ला हाउस के लिए दूसरा तांगा लेते हैं.
बापू के अंतिम दिन के एक-एक पल का ख़ुलासा करने वाले पत्रकार स्टीफन मर्फी लिखते हैं, "20 जनवरी को हुए हमले के बाद बिड़ला हाउस में 30 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई थी. नेहरू और पटेल के इस आग्रह को बापू ने मान लिया था. पर जब उन पर गोडसे गोली चलाते हैं, तब उनके साथ रहने वाले सादी वर्दी वाला पुलिसकर्मी एपी भाटिया ग़ैर-हाज़िर होते हैं. उस दिन उनकी कहीं और ड्यूटी लगा दी जाती है. उनके स्थान पर बापू की सुरक्षा में कोई तैनात नहीं होता. बापू के संग रहने वाले गुरुबचन सिंह भी नहीं थे. वो बापू के अटैंडेंट का काम करते थे."
एक सवाल ये भी कि क्या तब बिड़ला हाउस के भीतर कोई भी मजे से प्रवेश पा सकता था? क्या उधर आने वालों की कोई छानबीन नहीं होती थी? मतलब ये कि जिन सुरक्षाकर्मियों को बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था का ज़िम्मा था, वे क्या कर रहे थे?
भाटिया की 30 जनवरी को किसने और क्यों किसी अन्य जगह पर ड्यूटी लगा दी थी? अब इन सवालों के जवाब कोई नहीं देगा?
हां, ये ठीक है कि 30 जनवरी, 1948 को चांदनी चौक इलाक़े में सफ़ाई कर्मी अपनी मांगों के समर्थन में बड़ा प्रदर्शन कर रहे थे. इसलिए काफ़ी सुरक्षा कर्मी वहां भेज दिए गए थे.
तो क्या भाटिया भी चांदनी चौक में ही थे? मतलब बापू को मरने के लिए अकेले छोड़ दिया गया था.
अफ़सोस तो ये देखिए कि बापू के साथ सुबह-शाम रहने वाली उनकी निजी चिकित्सक डॉक्टर सुशीला नैयर भी उस दिन नहीं थीं. वो पाकिस्तान गई हुई थीं.
पर उन्हें गोली मारे जाने के कुछ देर के बाद डॉक्टर डीपी भार्गव और डॉक्टर जीवाजी मेहता वहां पहुंच गए थे.
डॉक्टर मेहता ने बापू को मृत घोषित किया था. बापू की निर्विवाद रूप से महानतम जीवनी 'दि लाइफ़ ऑफ़ महात्मा गांधी' में लुई फिशर लिखते हैं, "नेहरू भी तुरंत बिड़ला हाउस पहुंच गए थे. वे बापू के ख़ून से लथपथ शरीर से लिपटकर रो रहे थे. फिर बापू के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी, शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी बिड़ला हाउस आ गए.
बहरहाल, गांधी जी की हत्याकांड के दो मुख्य अभियुक्तों और मित्रों गोडसे और आप्टे को फांसी की सज़ा दी गई. शेष को उम्र क़ैद मिली.
बहरहाल, इतनी भयावह घटना के बाद क़ायदे से बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद किया जाना चाहिए था.
पर क्या इस बाबत कोई प्रयास हुए? अगर प्रयास किए गए होते तो बापू मारे नहीं जाते.
उधर, पहले प्रयास में कामयाबी ना मिलने के बावजूद गोडसे और आप्टे दस दिनों में दूसरी बार एयर इंडिया वाइकिंग विमान से बंमई से दिल्ली आते हैं.
ये दोनों 20 जनवरी के बाद बंबई चले गए थे. ज़ाहिर है कि पुलिस एक्शन के भय से इस बार ये मरीना होटल नहीं जाते.
अब इन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम ही सुरक्षित नज़र आ रहा था.
गोडसे ने नारायण आप्टे के साथ वेटिंग रूप में रात गुज़ारी. दिल्ली में 27 जनवरी को बापू के महरौली में सूफ़ी बख्तियार काकी की दरगाह में जाने की जानकारी मिलती है.
दरअसल काकी की दरगाह को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई थी. इससे बापू आहत थे. ये बापू के जीवन का कोई अंतिम कार्यक्रम था. ये मालूम चलने के बाद इनका ख़ून खौल उठता है.
तब विष्णु करकरे भी इनके साथ थे. इतिहासकार दिलीप सिमियन कहते हैं कि बापू के काकी की दरगाह में जाने के बाद तो इन्होंने तय कर लिया कि अब उन्हें जल्दी ही मार डाला जाए.
अब वह मनहूस 30 जनवरी का दिन आ जाता है. उस दिन इन्हें बापू की हत्या करनी है. बापू पर गोली नाथूराम गोडसे को चलानी थी. उधर से वे बिड़ला हाउस के लिए दूसरा तांगा लेते हैं.
बापू के अंतिम दिन के एक-एक पल का ख़ुलासा करने वाले पत्रकार स्टीफन मर्फी लिखते हैं, "20 जनवरी को हुए हमले के बाद बिड़ला हाउस में 30 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई थी. नेहरू और पटेल के इस आग्रह को बापू ने मान लिया था. पर जब उन पर गोडसे गोली चलाते हैं, तब उनके साथ रहने वाले सादी वर्दी वाला पुलिसकर्मी एपी भाटिया ग़ैर-हाज़िर होते हैं. उस दिन उनकी कहीं और ड्यूटी लगा दी जाती है. उनके स्थान पर बापू की सुरक्षा में कोई तैनात नहीं होता. बापू के संग रहने वाले गुरुबचन सिंह भी नहीं थे. वो बापू के अटैंडेंट का काम करते थे."
एक सवाल ये भी कि क्या तब बिड़ला हाउस के भीतर कोई भी मजे से प्रवेश पा सकता था? क्या उधर आने वालों की कोई छानबीन नहीं होती थी? मतलब ये कि जिन सुरक्षाकर्मियों को बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था का ज़िम्मा था, वे क्या कर रहे थे?
भाटिया की 30 जनवरी को किसने और क्यों किसी अन्य जगह पर ड्यूटी लगा दी थी? अब इन सवालों के जवाब कोई नहीं देगा?
हां, ये ठीक है कि 30 जनवरी, 1948 को चांदनी चौक इलाक़े में सफ़ाई कर्मी अपनी मांगों के समर्थन में बड़ा प्रदर्शन कर रहे थे. इसलिए काफ़ी सुरक्षा कर्मी वहां भेज दिए गए थे.
तो क्या भाटिया भी चांदनी चौक में ही थे? मतलब बापू को मरने के लिए अकेले छोड़ दिया गया था.
अफ़सोस तो ये देखिए कि बापू के साथ सुबह-शाम रहने वाली उनकी निजी चिकित्सक डॉक्टर सुशीला नैयर भी उस दिन नहीं थीं. वो पाकिस्तान गई हुई थीं.
पर उन्हें गोली मारे जाने के कुछ देर के बाद डॉक्टर डीपी भार्गव और डॉक्टर जीवाजी मेहता वहां पहुंच गए थे.
डॉक्टर मेहता ने बापू को मृत घोषित किया था. बापू की निर्विवाद रूप से महानतम जीवनी 'दि लाइफ़ ऑफ़ महात्मा गांधी' में लुई फिशर लिखते हैं, "नेहरू भी तुरंत बिड़ला हाउस पहुंच गए थे. वे बापू के ख़ून से लथपथ शरीर से लिपटकर रो रहे थे. फिर बापू के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी, शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी बिड़ला हाउस आ गए.
बहरहाल, गांधी जी की हत्याकांड के दो मुख्य अभियुक्तों और मित्रों गोडसे और आप्टे को फांसी की सज़ा दी गई. शेष को उम्र क़ैद मिली.
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