वो बताते हैं कि "कश्मीर के मुद्दे पर लगातार उनका यही स्टैंड रहा है कि
कश्मीर के लोगों की रज़ामंदी के ख़िलाफ़ कोई भी काम नहीं होना चाहिए. उनको
पाकिस्तान में रहना है या फिर हिंदुस्तान में ये उनका फ़ैसला होना चाहिए."
'लोहिया के विचार'
क़ुर्बान अली बताते हैं कि "जब नेहरू सरकार ने 1953 में शेख़ अब्दुल्लाह सरकार को बर्ख़ास्त किया तो लोहिया ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था. और जब शेख़ अब्दुल्लाह जम्मू की जेल में थे तो उन्होंने अपने दो सांसदों कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया और राम सेवक यादव को उनसे मिलने भेजा. उन्होंने उन्हें एक ख़त दिया था."
"इस ख़त को बाद में अर्जुन सिंह भदौरिया ने बाद में अपनी आत्मकथा में प्रकाशित किया था. इस ख़त में लिखा था 'शेख़ साहब हम आपके साथ हैं. हम चाहते हैं कि आप
'लोहिया के विचार' में वो ख़ुद लिखते हैं "कश्मीर का सवाल अलग से हल करने की बात चलती है मैं कुछ भी लेने-देने को तैयार नहीं हूं. मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ (भारत पाकिस्तान के महासंघ) के हल नहीं करूंगा. मैं साफ़ कहना चाहता हूं कि अगर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है तो चाहे कश्मीर हिंदुस्तान में रहे, चाहे पाकिस्तान के साथ रहे. चाहे कश्मीर एक अलग इकाई बन कर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान महासंघ में आए. पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर एक ही ख़ानदान के अंदर बने रहें."
इस बारे में और रोशनी डालते हुए क़ुर्बान अली कहते हैं, वो बंटवारे के पक्ष में नहीं थे.
वो बताते हैं, "लोहिया ने कहा है कि ये जो बंटवारा हुआ वो अप्राकृतिक था और कभी न कभी वो वक़्त आएगा कि जब भारत और पाकिस्तान मिलेंगे क्योंकि दोनों का एक ही इतिहास, भूगोल और संस्कृति है."
लोहिया का मानना था कि जब तक ये दोनों देश न मिल सकें तब तक इसका एक महासंघ बनना चाहिए.
कन्हैया त्रिपाठी लिखते हैं कि लोहिया का मानना था कि दुनिया के अगले दौर की बुनियाद एकीकरण की नींव पर ही रखी जा सकती है.
उनके अनुसार भारत-विभाजन की वजह से इस्लाम पर आधारित सांप्रदायिकता को एक भौगोलिक व ठोस रूप दिया जा चुका है, जिसके निरस्त होने से ही इस्लाम और हिंदू सांप्रदायिकता के पैरों तले की ज़मीन खिसकाई जा सकती है.
पूरे देश का नेतृत्व करें."
भारत-पाकिस्तान एकीकरण के हिमायती
राम मनोहर लोहिया का मानना था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान एक धरती के दो टुकड़े ही हैं और सोच-समझ कर काम करें तो 10-15 साल में फिर से एक हो सकते हैं.
में राम मनोहर लोहिया ख़ुद लिखते हैं "मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा. उनका कहना था कि हिंदुस्तान पाकिस्तान का महासंघ बनना चाहिए जिसमें कश्मीर चाहे किसी के साथ हो या फिर अलग इकाई बने, लेकिन महासंघ में आए."
'लोहिया के विचार'
क़ुर्बान अली बताते हैं कि "जब नेहरू सरकार ने 1953 में शेख़ अब्दुल्लाह सरकार को बर्ख़ास्त किया तो लोहिया ने इसका पुरज़ोर विरोध किया था. और जब शेख़ अब्दुल्लाह जम्मू की जेल में थे तो उन्होंने अपने दो सांसदों कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया और राम सेवक यादव को उनसे मिलने भेजा. उन्होंने उन्हें एक ख़त दिया था."
"इस ख़त को बाद में अर्जुन सिंह भदौरिया ने बाद में अपनी आत्मकथा में प्रकाशित किया था. इस ख़त में लिखा था 'शेख़ साहब हम आपके साथ हैं. हम चाहते हैं कि आप
'लोहिया के विचार' में वो ख़ुद लिखते हैं "कश्मीर का सवाल अलग से हल करने की बात चलती है मैं कुछ भी लेने-देने को तैयार नहीं हूं. मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ (भारत पाकिस्तान के महासंघ) के हल नहीं करूंगा. मैं साफ़ कहना चाहता हूं कि अगर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है तो चाहे कश्मीर हिंदुस्तान में रहे, चाहे पाकिस्तान के साथ रहे. चाहे कश्मीर एक अलग इकाई बन कर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान महासंघ में आए. पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर एक ही ख़ानदान के अंदर बने रहें."
इस बारे में और रोशनी डालते हुए क़ुर्बान अली कहते हैं, वो बंटवारे के पक्ष में नहीं थे.
वो बताते हैं, "लोहिया ने कहा है कि ये जो बंटवारा हुआ वो अप्राकृतिक था और कभी न कभी वो वक़्त आएगा कि जब भारत और पाकिस्तान मिलेंगे क्योंकि दोनों का एक ही इतिहास, भूगोल और संस्कृति है."
लोहिया का मानना था कि जब तक ये दोनों देश न मिल सकें तब तक इसका एक महासंघ बनना चाहिए.
कन्हैया त्रिपाठी लिखते हैं कि लोहिया का मानना था कि दुनिया के अगले दौर की बुनियाद एकीकरण की नींव पर ही रखी जा सकती है.
उनके अनुसार भारत-विभाजन की वजह से इस्लाम पर आधारित सांप्रदायिकता को एक भौगोलिक व ठोस रूप दिया जा चुका है, जिसके निरस्त होने से ही इस्लाम और हिंदू सांप्रदायिकता के पैरों तले की ज़मीन खिसकाई जा सकती है.
पूरे देश का नेतृत्व करें."
भारत-पाकिस्तान एकीकरण के हिमायती
राम मनोहर लोहिया का मानना था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान एक धरती के दो टुकड़े ही हैं और सोच-समझ कर काम करें तो 10-15 साल में फिर से एक हो सकते हैं.
में राम मनोहर लोहिया ख़ुद लिखते हैं "मेरा बस चले तो मैं कश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूंगा. उनका कहना था कि हिंदुस्तान पाकिस्तान का महासंघ बनना चाहिए जिसमें कश्मीर चाहे किसी के साथ हो या फिर अलग इकाई बने, लेकिन महासंघ में आए."
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