Friday, June 21, 2019

خمس طرق جديدة توفر الطعام لسكان العالم في عام 2050

تواجه الزراعة تحديا غير مسبوق على مستوى العالم لتوفير ما يكفي من غذاء يتناسب مع الزيادة السكانية الهائلة في المستقبل، الأمر الذي دفع إلى ضرورة طرح بدائل جديدة تهدف إلى التصدي للمشكلة.
وسيكون من الضروري، مع استمرار الزيادة السكانية على مستوى العالم والتي قد تصل بحسب تقديرات إلى نحو 10 مليارات نسمة بحلول عام 2050، إنتاج كميات هائلة من الغذاء لتوفير الطعام لهذا العدد الكبير من البشر.
ويتضح قدر هذا التحدي إذا أدركنا أنه لم يبق أمامنا سوى 30 موسما للزراعة والحصاد قبل أن يصل تعداد سكان العالم إلى هذا العدد، وبناء عليه لابد من تغيير نمط الزراعة التقليدية بشكلها الحالي إن أردنا توفير الطعام على الكوكب.
سافرت خلال الستة أشهر الماضية في شتى أرجاء أوروبا وتحدثت مع رواد في مجال العلم والهندسة فضلا عن قادة فكر عالميين وتجار تجزئة أذكياء وبالطبع مع مزارعين على دراية بالمهنة ولديهم قدرة عالية على مواكبة التغيير.
أجريت لقاءات لصالح بي بي سي وسلسلة حلقات "فيوتشر" بعنوان "تتبع الغذاء" تهدف إلى تناول عدة قضايا تتعلق بتوفير الطعام والتوصل إلى حلول لمواجهة تحدياتنا في المستقبل، لاسيما وأن العالم يواجه حاليا تحولا ماسا ليس في الزراعة فحسب، بل في سلسلة الإمداد الغذائي بأكملها.
وفيما يلي خمسة حلول قد تساعدنا في توفير الطعام لعشرة مليارات نسمة :
تمهل قليلا قبل أن تتعجل بالشكوى من أن الروبوت يسرق وظائفنا، إنصت إليّ.
يتحدث كثير من المزارعين عن حالة ملل أصابتهم من جراء قضاء ساعات طويلة في الحقول وقيادة الجرارات، وهي فترة كان بإمكانهم استغلالها في أداء أعمال أخرى حيوية تتعلق بعملهم الأساسي.
واستطاعت شركة "الروبوت الصغير" إنتاج ثلاثة من أجهزة الروبوت الصغيرة أطلقت عليها أسماء "توم" و "ديك" و"هاري".
يلتقط الروبوت "توم" صورا مزودة ببيانات زراعية يمكن دراستها، بينما يؤدي الروبوت "ديك" أعمال رش المحاصيل بدقة على نحو يغني عن رش الحقول بطريقة المسطحات المعمول بها حاليا، ويحد من تسرب المبيدات الملوثة للبيئة ويرشد التكلفة، في حين يغرس الروبوت "هاري" النباتات مستعينا بذراع حفر آلية.
وتؤدي أجهزة الروبوت الثلاثة تلك المهام الرتيبة التي يشكو منها المزارعون، ويؤدونها بأعلى درجات الدقة وبأقل هدر.
تستطيع أجهزة الروبوت الصغيرة المتنقلة أداء أعمال كثيرة بدلا من استخدام الجرارات الزراعية التقليدية ثقيلة الوزن والتي تضغط على التربة وتجعلها مصمتة بتفريغ الهواء من ثناياها ولا تترك مساحة كافية لتخلل الهواء والماء، الأمر الذي يؤثر على قدرة التربة على الاحتفاظ بالرطوبة وامتصاص النبات لها والعناصر الغذائية المطلوبة.
ويعد استخدام أجهزة روبوت صغيرة خفيفة الوزن بدلا من الجرارات حلا لكثير من المشكلات السابقة.
تخامرني الدهشة عندما أعلم كم هي كمية الأغذية الصالحة للأكل التي يُلقى بها في النفايات.
وبحسب تقديرات الأمم المتحدة : "يُلقى ثُلث الطعام المنتج في سلة قمامة المستهلك أو كنفاية لدى تاجر التجزئة أو يتلف من جراء سوء النقل وسوء وسائل الحصاد".
وتعاني هولندا، وهي ثاني أكبر دولة مصدرة للمنتجات الزراعية (من حيث القيمة) بعد الولايات المتحدة، من مشكلة إهدار كبرى.
ويزداد حجم التالف كلما ازدادت حركة نقل الأغذية عبر هولندا، بيد أن الحكومة تعهدت بأن تصبح أول دولة أوروبية من حيث خفض كم الغذاء المهدر إلى النصف بحلول عام 2030.
وثمة أفكار ومبادرات كثيرة تهدف إلى تفادي المشكلة، غير أنني سأتحدث عن فكرة طموحة بشكل خاص تعتمد على استخدام تطبيقات مثل تطبيق يُعرف باسم "تو غود تو غو" )Too Good To Go)، وهو تطبيق يتيح لصاحب المتجر طرح أغذية صالحة للأكل للمستهلك بأسعار مخفضة بدلا من التخلص منها.
يُقطف الموز من على الأشجار وهو لايزال أخضر اللون ويقضي فترة تصل إلى نحو 40 يوما على متن السفن قبل أن يستقر على أرفف متاجر السوبرماركت، ليباع أصفر اللون للمستهلك قبل اسوداد لونه، وهو أمر يتطلب إدارة هائلة ورعاية فائقة.
ولو نضجت موزة واحدة قبل وصولها إلى يد المستهلك فإنها تطلق غاز الإيثيلين الذي يؤدي إلى نضج بقية الموز، الأمر الذي يؤدي إلى تلف 15 بالمئة من شحنة الموز بأكملها بسبب هذه الموزة التالفة، وهو بالطبع كم هائل يكون مصيره مكب القمامة.
ويعكف علماء في مؤسسة "نوريتش" البريطانية على تعديل الخريطة الوراثية للموز بهدف تقليل كميات غاز الإيثيلين الذي يطلقه، وبالتالي تقليل حجم الخسارة أثناء عمليات الشحن والنقل، وإطالة عمر الموز على أرفف المتاجر.
وقد يمثل ذلك خيارا في بعض مناطق العالم، بيد أنه في أماكن أخرى كالاتحاد الأوروبي تخضع عملية التعديل الوراثي للمحاصيل الزراعية لقيود شديدة وتتطلب وقتا طويلا للموافقة عليها.
أدركت بعد قضاء وقت بين مزارعين ومنتجين وتجار ومستهلكين أن الوسائل التي نستعين بها حاليا في الزراعة ونقل وبيع الأغذية غير مستدامة.
ويعد السبيل الوحيد لتوفير الطعام لنحو 10 مليارات من البشر بحلول عام 2050 هو أن تصبح الزراعة والصناعات الغذائية أكثر استدامة، وهو ما يتطلب تعديل أنماط الزراعة والنقل والتصنيع والتخزين والبيع، وأن تتحرك الأعمال والحكومات للأخذ بذلك، ونحن أيضا كمستهلكين.
ويتعين على المستهلك أن يترفع عن شراء خضراوات "لا تبدو مناسبة" من حيث الشكل، مع تشجيع متاجر السوبر ماركت على إضافة معلومات بشأن المنتج الغذائي توضح لنا كمية الماء والكربون التي يحتوي عليها الغذاء، وبالتالي يمكن للمستهلك شراء ثمرة استُخدمت في زراعتها كميات مياه أقل، أو استخدام تقنيات جديدة للحد من الإهدار، لاسيما وأننا نملك الكثير للحفاظ على طعامنا وتقدير ما يبذله منتجوه من جهد.
ولا يعد الوصول إلى عالم يتغذى على زراعة مستدامة بالأمر السهل، بيد أن جهود مزارعين وعلماء ومهندسين وتجار ورجال أعمال وحكومات تتضافر بغية ضمان توافر أمننا الغذائي في المستقبل.
وأنا أفكر على المستوى الشخصي في حجم الجهد الذي يمكنني أن أبذله للمشاركة في هذه الجهود

Monday, June 17, 2019

यरुशलम का 700 साल पुराना स्पा फिर 'ज़िंदा'

अल-ऐन हम्माम को 1336 ईस्वी के आसपास बनाया गया था. 20वीं सदी में यह टूट-फूट गया था. अब कई साल की मरम्मत के बाद इसे फिर से तैयार किया गया है.
यरुशलम की गलियों के पीछे छिपा एक पुराना हम्माम फिर से ज़िंदा हो रहा है.
यह सामूहिक स्नानघर 1970 के दशक की शुरुआत से ही बंद पड़ा था और बुरी हालत में पहुंच गया था.
14वीं सदी में बनाए अल-ऐन हम्माम, इसके ऊपर बने खान टंकीज़ प्लाज़ा और पास के ही अल-शिफ़ा हम्माम में बड़े पैमाने पर मरम्मत की गई है.
अल-ऐन हम्माम को इसी साल दोबारा पूरी तरह खोल दिया जाएगा. मेहमान यहां स्टीम बाथ ले सकेंगे और स्पा की दूसरी सुविधाओं का भी लुत्फ़ उठा सकेंगे.
1336 ईस्वी के आसपास बनाया गया यह हम्माम उन मुस्लिमों के काम आता था जो पास की अल-अक्सा मस्जिद और क़ुब्बतुल सख़रह (डोम ऑफ़ द रॉक) में प्रार्थना करने से पहले वज़ू करना चाहते थे.
व्यापारी और स्थानीय लोग भी यहां नहाने आते थे. करीब एक सदी पहले यहां के घरों में पाइप से पानी की आपूर्ति सामान्य बात हो गई, तब नहाने के लिए हम्माम में बहुत कम लोग आने लगे.
20वीं सदी के मध्य में ऐसे हम्माम चलन से बाहर हो गए.
यरुशलम के कुछ होटलों ने अपने स्पा कॉम्प्लेक्स में आधुनिक स्नानघर बनाए हैं. उनके अलावा दोबारा बहाल किया गया अल-ऐन हम्माम ही यरुशलम का अकेला हम्माम बचा है.
पास का अल-शिफ़ा हम्माम अब आर्ट-गैलरी और इवेंट स्पेस में तब्दील हो चुका है.
अल-क़ुद्स यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर यरुशलम स्टडीज के डायरेक्टर अमन बशीर कहते हैं, "इसे फिर से हम्माम के रूप में ही खोलना बहुत अहम है. सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने का यही एक तरीका है."
यहां की मरम्मत कराने और इसे फिर से चालू होने लायक बनाने में सेंटर का बड़ा हाथ रहा है.
मिलने-जुलने की जगह
पत्थर और संगमरमर से बना हम्माम का मूल ढांचा बरकरार है.
नहाने के लिए आने वाले मेहमान यहां सदियों पुरानी पत्थर की बेंच पर बैठकर भाप ले सकते हैं और विशाल मेहराबों और रंगीन संगमरमर से सजाए गए फर्श को निहार सकते हैं.
यरुशलम की अल-क़ुद्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और यरुशलम इस्लामिक वक़्फ़ में पुरातत्व विभाग के निदेशक यूसुफ़ नात्शेह कहते हैं, "इस बाथहाउस का मालिकाना कई बार बदला, लेकिन इसका मूल स्थापत्य बरकरार रहा."
इस्लामिक वक़्फ़ खान टंकीज़ साइट और यरुशलम की दीवार वाले पुराने शहर के अन्य प्रमुख मुस्लिम स्थलों की देखरेख करता है.
लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया
स्नानघर की मरम्मत करके दोबारा खोलना आसान नहीं था. वक़्फ़ ने इसकी योजना 1980 के दशक में ही बनाई थी, लेकिन पर्याप्त पैसे नहीं जुट पा रहे थे.
नात्शेह के मुताबिक यूरोपीय संघ ने यरुशलम की सांस्कृतिक विरासत को बचाने के बड़े कार्यक्रम के तहत इसके लिए भी फंडिंग की तो काम शुरू हुआ.
हम्माम को पुराने स्वरूप में बहाल करने में पांच साल लगे. इस कार्यक्रम की निगरानी इसरायल एंटिक्विटीज अथॉरिटी ने की.
अल-ऐन हम्माम के बगल का परिसर यरुशलम के कॉटन मर्चेंट्स मार्केट के ठीक सामने पड़ता है.
यह बाज़ार किसी जमाने में कपड़ा व्यापारियों का आर्थिक केंद्र हुआ करता था.
यात्री और जायरीन शहर में आने के बाद पानी और अपने ऊंटों को चारा खिलाने के लिए यहां रुकते थे. आज भी मेहमान यहां आराम कर सकते हैं.
यहां के कमरे अल-क़ुद्स यूनिवर्सिटी के अकादमिक प्रोग्राम और अरबी भाषा की पढ़ाई के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं.
छत वाली गली का बाज़ार
हम्माम की मरम्मत की परियोजना में पास के कॉटन मर्चेंट्स मार्केट को बड़ा करना और अल-अक्सा मस्जिद कॉम्प्लेक्स से खरीदारी के क्षेत्र को अलग करने वाला एक विशाल दरवाज़ा लगाना शामिल था.
छत वाली इस गली में आज भी बाज़ार लगता है, जिसमें क़ुब्बतुल सख़रह (डोम ऑफ़ द रॉक) और अल-अक्सा मस्जिद जाने वाले जायरीनों के लिए मिठाइयां, स्मृति चिह्न, प्रार्थना की चटाई और स्कार्फ जैसी चीजें मिलती हैं.
रिसेप्शन रूम में लकड़ी की जालियां और लाल, सफेद और काले रंगों की योजना हम्माम की मूल शैली की याद दिलाते हैं.
मरम्मत के दौरान यहां के वास्तुशिल्प लेआउट या डिजाइन को नहीं बदला गया, लेकिन रोशनी के इंतज़ाम के लिए नई लाइटिंग की गई और नये शावर लगाए गए.
यह हम्माम पहले बारिश और पहाड़ी झरने के पानी से चलता था. बारिश के पानी को जमा करने के लिए बड़े कुंड बनाए गए थे.
पहाड़ी झरने के पानी को हम्माम तक लाने के लिए शहर के बाहर से यहां तक सोते तैयार किए गए थे. मगर अब यहां का स्नानघर और फव्वारा आधुनिक पाइपलाइन पर निर्भर है.
मेहमान यहां आराम फरमा सकते हैं और स्पा का लुत्फ़ उठाने से पहले लोगों से मिल-जुल सकते हैं. यह जगह विशेष आयोजनों के लिए भी उपलब्ध है.
बशीर कहते हैं, "अतीत में इस हम्माम ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक भूमिका निभाई है. अब हम उस भूमिका को फिर से ज़िंदा करने में मदद कर रहे हैं. पुराने शहर में इसके लिए जगह नहीं है."
अल-ऐन हम्माम में कई आकार के गुंबद हैं. वहां सुराख बने हुए हैं, जहां से नीली और पीले कांच से छनकर रोशनी अंदर आती है.
ये गुंबद ठीक वैसे ही हैं जैसे दमिश्क के स्नानघरों में हैं. यरुशलम की हिब्रू यूनिवर्सिटी के पुरातत्व विज्ञानी तौफ़ीक़ डाडली को लगता है कि सीरिया के राजमिस्त्रियों और कलाकारों ने यरुशलम आकर इनका निर्माण किया होगा.
मरम्मत के दौरान खुदाई से एक तीसरे स्नानघर का भी पता चला जो एल-ऐन हम्माम से एक भट्ठी साझा करता था.
यह तीसरा हम्माम यहूदियों के ओहेल यित्ज़ाक प्रार्थनाघर के नीचे है.
इसे अभी आम लोगों के लिए नहीं खोला गया है, लेकिन पुरातत्वविदों का कहना है कि इससे मूल ढांचे के विस्तार और उसके भव्य स्वरूप का पता चलता है.

Tuesday, May 21, 2019

केदारनाथ: पीएम मोदी ने गुफा में ध्यान लगाया या 'होटल' में?

पाहवा और विष्णु करकरे पहले बिड़ला हाउस पहुंच गए थे. शेष को टैक्सी ड्राइवर सुरजीत सिंह लेकर आता है. सुरजीत सिंह बाद में सरकारी गवाह बन गए थे. मदन लाल पाहवा वहां पर एक फोटोग्राफऱ के रूप में पहुंचते हैं. धमाके के बाद उसके साथी वहां से निकल भागे.
बहरहाल, इतनी भयावह घटना के बाद क़ायदे से बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद किया जाना चाहिए था.
पर क्या इस बाबत कोई प्रयास हुए? अगर प्रयास किए गए होते तो बापू मारे नहीं जाते.
उधर, पहले प्रयास में कामयाबी ना मिलने के बावजूद गोडसे और आप्टे दस दिनों में दूसरी बार एयर इंडिया वाइकिंग विमान से बंमई से दिल्ली आते हैं.
ये दोनों 20 जनवरी के बाद बंबई चले गए थे. ज़ाहिर है कि पुलिस एक्शन के भय से इस बार ये मरीना होटल नहीं जाते.
अब इन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम ही सुरक्षित नज़र आ रहा था.
गोडसे ने नारायण आप्टे के साथ वेटिंग रूप में रात गुज़ारी. दिल्ली में 27 जनवरी को बापू के महरौली में सूफ़ी बख्तियार काकी की दरगाह में जाने की जानकारी मिलती है.
दरअसल काकी की दरगाह को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई थी. इससे बापू आहत थे. ये बापू के जीवन का कोई अंतिम कार्यक्रम था. ये मालूम चलने के बाद इनका ख़ून खौल उठता है.
तब विष्णु करकरे भी इनके साथ थे. इतिहासकार दिलीप सिमियन कहते हैं कि बापू के काकी की दरगाह में जाने के बाद तो इन्होंने तय कर लिया कि अब उन्हें जल्दी ही मार डाला जाए.
अब वह मनहूस 30 जनवरी का दिन आ जाता है. उस दिन इन्हें बापू की हत्या करनी है. बापू पर गोली नाथूराम गोडसे को चलानी थी. उधर से वे बिड़ला हाउस के लिए दूसरा तांगा लेते हैं.
बापू के अंतिम दिन के एक-एक पल का ख़ुलासा करने वाले पत्रकार स्टीफन मर्फी लिखते हैं, "20 जनवरी को हुए हमले के बाद बिड़ला हाउस में 30 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई थी. नेहरू और पटेल के इस आग्रह को बापू ने मान लिया था. पर जब उन पर गोडसे गोली चलाते हैं, तब उनके साथ रहने वाले सादी वर्दी वाला पुलिसकर्मी एपी भाटिया ग़ैर-हाज़िर होते हैं. उस दिन उनकी कहीं और ड्यूटी लगा दी जाती है. उनके स्थान पर बापू की सुरक्षा में कोई तैनात नहीं होता. बापू के संग रहने वाले गुरुबचन सिंह भी नहीं थे. वो बापू के अटैंडेंट का काम करते थे."
एक सवाल ये भी कि क्या तब बिड़ला हाउस के भीतर कोई भी मजे से प्रवेश पा सकता था? क्या उधर आने वालों की कोई छानबीन नहीं होती थी? मतलब ये कि जिन सुरक्षाकर्मियों को बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था का ज़िम्मा था, वे क्या कर रहे थे?
भाटिया की 30 जनवरी को किसने और क्यों किसी अन्य जगह पर ड्यूटी लगा दी थी? अब इन सवालों के जवाब कोई नहीं देगा?
हां, ये ठीक है कि 30 जनवरी, 1948 को चांदनी चौक इलाक़े में सफ़ाई कर्मी अपनी मांगों के समर्थन में बड़ा प्रदर्शन कर रहे थे. इसलिए काफ़ी सुरक्षा कर्मी वहां भेज दिए गए थे.
तो क्या भाटिया भी चांदनी चौक में ही थे? मतलब बापू को मरने के लिए अकेले छोड़ दिया गया था.
अफ़सोस तो ये देखिए कि बापू के साथ सुबह-शाम रहने वाली उनकी निजी चिकित्सक डॉक्टर सुशीला नैयर भी उस दिन नहीं थीं. वो पाकिस्तान गई हुई थीं.
पर उन्हें गोली मारे जाने के कुछ देर के बाद डॉक्टर डीपी भार्गव और डॉक्टर जीवाजी मेहता वहां पहुंच गए थे.
डॉक्टर मेहता ने बापू को मृत घोषित किया था. बापू की निर्विवाद रूप से महानतम जीवनी 'दि लाइफ़ ऑफ़ महात्मा गांधी' में लुई फिशर लिखते हैं, "नेहरू भी तुरंत बिड़ला हाउस पहुंच गए थे. वे बापू के ख़ून से लथपथ शरीर से लिपटकर रो रहे थे. फिर बापू के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी, शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद भी बिड़ला हाउस आ गए.
बहरहाल, गांधी जी की हत्याकांड के दो मुख्य अभियुक्तों और मित्रों गोडसे और आप्टे को फांसी की सज़ा दी गई. शेष को उम्र क़ैद मिली.

Monday, May 6, 2019

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

एक सवाल यह भी उठता है कि कांग्रेस को समर्थन देकर क्या सपा-बसपा का गठबंधन अंतिम के चरणों में उन जगहों पर फ़ायदा लेना चाहता है जहां कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं?
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "कांग्रेस ने पहले ही एक तरह से इशारा कर दिया है कि जहां हमारी जीतने की संभावना न हो, वहां गठबंधन के प्रत्याशी को वोट दें."
"एक तरह से यह प्री-पोल अंडरस्टैंडिंग है. कांग्रेस ने तमाम जगहों पर ऐसे उम्मीदवार उतारे हैं, जो भाजपा का नुक़सान कर सकते हैं. कांग्रेस ने भाजपा के पटेल के ख़िलाफ़ पटेल उम्मीदवार या फिर ब्राह्मण के ख़िलाफ़ ब्राह्मण उम्मीदवार ही मैदान में उतारा है."
यह ऐसा इसलिए किया गया है ताकि भाजपा विरोधी वोट न बंटे और भाजपा को नुक़सान हो.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शनिवार को प्रतापगढ़ की रैली में कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा था कि "जो पार्टी पहले चरण के मतदान से पहले ख़ुद को प्रधानमंत्री पद की दावेदार बता रही थी वो अब यह मानने लगी हैं कि हम तो उत्तर प्रदेश में सिर्फ़ वोट काटने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. ये वोट कटाऊ पार्टी बन गई है."
इन दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने समाजवादी पार्टी की एक रैली में मंच साझा किया था. जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बसपा को सपा के हाथों ठगे जाने की बात कही.
नरेंद्र मोदी ने शनिवार को प्रतपागढ़ की रैली में कहा था कि "समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के बहाने बहन मायावती का तो फ़ायदा उठा लिया, चालाकी की, उनको अंधेरे में रखा, बड़े-बड़े मान-सम्मान की बातें की. आपको प्रधानमंत्री बना देंगे, ये भी कह दिया है."
"लेकिन अब बहन मायावती को यह समझ आ गया है कि ये सपा और कांग्रेस ने मिल कर बहुत बड़ा खेल खेला है. दूसरी तरफ़ कांग्रेस के नेता ख़ुशी-ख़ुशी समाजवादी पार्टी की रैलियों में मंच साझा कर रहे हैं. बहनजी को ऐसा धोखा इन लोगों ने दिया है कि उन्हें भी समझ नहीं रहा है."
इस पर पलटवार कहते हुए मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री का यह बयान उनकी हताशा बताता है.
उन्होंने कहा, "भाजपा हमारे गठबंधन की दोनों पार्टियों के बीच फूट डालो और राज करो की नीति अपना रही है. बाक़ी के बचे चरणों के चुनाव में भाजपा अपनी कुछ इज़्ज़त बचा सके, इसलिए ये हताश नीति अपना रही हैं."
क्या वाक़ई भाजपा ने हताशा में ये बातें कही है, इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी कहते हैं कि जिस तरह का माहौल बन रहा है, उसमें भाजपा को अपना रास्ता स्पष्ट नहीं दिख रहा है.
वो कहते हैं कि भाजपा बसपा के वोटरों को यह संदेश देना चाहती है कि बहनजी के साथ ग़लत हो रहा है. अगर कल को भाजपा को सरकार बनाने के लिए बसपा के समर्थन की ज़रूरत पड़ती है तो वो आज से ही इसकी पृष्ठभूमि तैयार कर रही है.
नवीन जोशी कहते हैं, "चुनावों के बाद क्या गणित बनेगा, उसमें मायावती कहां जा सकती हैं, आज कहना मुश्किल है. मायावती का जिस तरह का व्यवहार रहा है, उसके आधार पर वो अचानक बदल भी सकती हैं."
भाजपा को यह संभावना दिखाई दी कि समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन के मंच पर अगर प्रियंका गांधी पहुंच गई तो इसको एक हथियार बनाकर बसपा को सपा के ख़िलाफ़ भड़काया जाए और भविष्य में इसका फ़ायदा उठाया जाए.
मायावती पहले भी भाजपा के सहयोग से कई बार सरकार बना चुकी हैं. नवीन जोशी इसे पार्टी की सोची समझी रणनीति मानते हैं. हालांकि ये रणनीतियां कितनी काम आती हैं, यह 23 मई को परिणाम आने के बाद ही पता चल पाएगा.
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Tuesday, April 9, 2019

الغارديان: تنامي الضغوط على البشير وسط اختبار المتظاهرين ولاء قوات الأمن

نبدأ من صحيفة الغارديان التي نشرت تقريراً لجايسون بورك بعنوان " تنامي الضغوط على البشير وسط اختبار المتظاهرين ولاء قوات الأمن".
وقال كاتب التقرير إن عشرات الآلاف من المتظاهرين نزلوا إلى الشوارع وسط تنامي إشارات التصدع بين قوات الأمن، الأمر الذي قد يمثل تحدياً حقيقياً للحكم القمعي للرئيس السوداني عمر البشير.
وأضاف أن المتظاهرين تحدوا ارتفاع درجات الحرارة وساروا في العاصمة الخرطوم لملاقاة مجموعات أكبر من السودانيين الذين رابطوا على مدار 72 ساعة أمام مجمع من المنشآت العسكرية المدججة بالأسلحة في وسط المدينة.
وأردف أن عدة تقارير تحدثت عن تظاهرات مماثلة في جميع أنحاء البلاد.
وتابع بالقول إن قوات الأمن حاولت تفريق المتظاهرين باستخدام الغاز المسيل للدموع وبإطلاق الرصاصات المطاطية وسط تقارير تشير إلى أن بعض الجنود عمدوا إلى حماية المدنيين من وحدات خاصة تتلقى أوامرها مباشرة من الرئاسة السودانية.
ونقل كاتب التقرير عن شاهد عيان إن جندياً واحدا قتل خلال الاشتباكات.
ويطالب المتظاهرون بتنحي البشير الذي استولى على سدة الرئاسة جراء انقلاب عسكري في .
ونقل كاتب التقرير عن أحمد سليمان، محلل في شتام هاوس في لندن قوله إن "عدد المتظاهرين يتزايد ، كما أن هناك تقارير غير مؤكدة بأن الجيش يحمي المتظاهرين:، مضيفاً أن "هذا الأمر يعتبر تطوراً هاماً".
وختم بالقول إن الجماعات التي تقود المتظاهرات أسست مجلساً لبدء محادثات مع قوات الأمن في البلاد.
ونشرت الصحيفة تقريرا لباتريك وينتور محرر الشؤون الديبلوماسية حاول من خلاله أن يشرح للقارئ أهمية مدينة طرابلس التي يسعى اللواء السابق خليفة حفتر للسيطرة عليها.
ويعتبر وينتور أن الجولة الأحدث في الحرب الأهلية في ليبيا قوضت سنوات من العمل الديبلوماسي والسعي الدولي الحثيث للمصالحة الوطنية بين الحكومة القائمة في شرق البلاد تحت سيطرة حفتر التي تحظى بدعم مصري إماراتي وحكومة طرابلس التي تحظى بدعم الأمم المتحدة.
ويشير وينتور إلى ان الحكومة الفرنسية الأقرب إلى حفتر من بين حكومات أوروبا تؤكد أنها لم تكن على علم مسبق بهذا الهجوم الذي يمكنه أن يقوض الأمن ليس فقط في ليبيا ولكن أيضا في البحر الأبيض المتوسط ويؤثر على مسيرة الديمقراطية في منطقة الشرق الأوسط كلها.
ويضيف وينتور أن ليبيا ممزقة بين تدخلات القوى الإقليمية حيث تحظى حكومة الغرب بدعم تركي و قطري بينما تدعم مصر والإمارات والسعودية حكومة الشرق، مشيرا إلى ان القوى الغربية ومنها فرنسا وإيطاليا والأمم المتحدة دعموا عمليات مصالحة طوال السنوات الماضية متأثرين بمصالح اقتصادية بيما كان موقف روسيا متقلبا.
ويعتبر وينتور أن الغرب حتى الآن لايزال متموضعا خلف خطة السلام التي بدأتها الأمم المتحدة وتدعم من خلالها حكومة فايز السراج في طرابلس وهو ما دعاهم لتحذير حفتر من مواصلة الهجوم لكن هذه الرسالة يجب أن تصل إلى حفتر من خلال داعميه.
ويختم وينتور قائلا " إن الأيام القادمة وسير المعار
وننتقل إلى صحيفة التايمز التي نشرت مقالاً لجوناثان آيمز بعنوان " أطلقوا سراح أمي، طفلة تناشد الشيخ الإماراتي".
وقال كاتب المقال إن مراهقة تناشد حاكم دبي بأطلاق سراح والدتها التي تواجه السجن لمدة عامين بسبب "إهانة زوجة طليقها على الفيسبوك، وذلك بموجب قوانين الجرائم الإلكترونية الصارمة في دبي.
وقال كاتب المقال إن باريس شارافش (14 عاما) أرسلت رسالة من لندن إلى الشيخ محمد بن راشد آل مكتوم جاء فيها " أرجوك، أرجوك أعد جواز السفر لأمي لتعود إلى المنزل".
وأضافت في الرسالة أن "أمها لاله شارافش (55 عاما) معتقلة في دبي منذ 4 أسابيع عندما سافرتا معا إلى دبي لحضور جنازة والد باريس الذي توفي جراء سكتة قلبية مفاجئة".
وتابعت بالقول إن الشرطة أجبرتهما على الانتظار في غرفة الهجرة لمدة 4 ساعات وسط محاولات حثيثة لنقل والدتها إلى مركز للشرطة للإدلاء بإفادتها، مشيرة إلى أنها فصلت عن والدتها حتى تستطيع الأخيرة الإدلاء بإفادتها، كما أن الشرطة رفضت الاستماع إلى أمي لأنها كانت تبكي كما أنها أجبرت على توقيع إفادة مكتوبة باللغة العربية التي لا تتقنها.
ك هو في الغالب الذي سيحدد إن كان حفتر سيفكر في تصحيح أوضاعه والإنصات إلى النصائح المقدمة إليه".

Tuesday, April 2, 2019

तेज प्रताप को परिवार, पत्नी और आरजेडी से विद्रोह कर क्या मिला

लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने सोमवार शाम पटना में एक प्रेस कांफ्रेंस करके लालू राबड़ी मोर्चा का गठन का एलान किया.
उन्होंने जहानाबाद और शिवहर से अपने उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा कर दी. उन्होंने ये भी बताया कि शिवहर से अंगेश कुमार और जहानाबाद से चंद्र प्रकाश उनके मोर्चे के उम्मीदवार हैं.
उन्होंने ये भी कहा कि सारण की सीट लालू की पारंपरिक सीट रही है और वे अपनी माता राबड़ी देवी से अनुरोध कर रहे हैं कि वे वहां से चुनाव लड़ें, ऐसा नहीं होने पर उन्होंने वहां से खुद को चुनाव मैदान में उतारने की बात कही.
सारण से आरजेडी ने तेज प्रताप के ससुर चंद्रिका राय को उम्मीदवार बनाया है.
हालांकि जब पत्रकारों ने तेज प्रताप यादव से पूछा कि क्या वे आरजेडी से अलग हो गए हैं तो उन्होंने कहा कि आरजेडी और लालू राबड़ी मोर्चा एक ही है और तेजस्वी उनके अर्जुन हैं.
दोनों बेटों को राजनीति में पिता लालू प्रसाद यादव ने 2013 में पटना की परिवर्तन रैली में लॉन्च किया था. मतलब न दोनों की उम्र ज़्यादा है और न ही राजनीति में आए ज़्यादा दिन हुए हैं.
लालू प्रसाद के परिवार को क़रीब से नज़र रखने वाले लोग इस बात को बड़े भरोसे से कहते हैं कि तेजस्वी के प्रति लालू का स्नेह तेजप्रताप की तुलना में हमेशा से ज़्यादा रहा है.
वहीं मां राबड़ी देवी ने इस बात को हमेशा सुनिश्चित करने की कोशिश की कि तेज प्रताप को ऐसा महसूस ना हो कि उसकी उपेक्षा हो रही है.
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी और तेज प्रताप चुनावी मैदान में उतरे और दोनों ने जीत दर्ज की. तेजस्वी बिहार के उपमुख्यमंत्री बने और तेज प्रताप स्वास्थ्य मंत्री. कहा जाता है कि लालू के इस फ़ैसले से तेज प्रताप ख़ुश नहीं थे और उसके बाद से ही उनके मन में उपेक्षा का भाव घर करने लगा.
लालू प्रसाद यादव जेल में हैं और दोनों भाइयों के रिश्तों कड़वाहट सतह पर आ गई है. तेज प्रताप ने छात्र आरजेडी के संरक्षक पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
अपने पसंद के व्यक्तियों को लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल का टिकट नहीं मिलने के कारण तेज प्रताप ने ऐसा किया है. इस्तीफ़ा देने के बाद तेज प्रताप ने ट्वीट कर कहा- नादान हैं वो जो उन्हें नादान समझते हैं.
स्थिति तब और बिगड़ गई जब तेजस्वी यादव ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर महागठबंधन के उम्मीदवारों की घोषणा की. आरजेडी की इस घोषणा में बताया गया कि पूर्व मंत्री चंद्रिका राय सारण से बीजेपी के राजीव प्रताप रूड़ी को चुनौती देंगे.
कहा जा रहा है कि चंद्रिका राय को टिकट मिलना तेज प्रताप के लिए एक और झटका था. चंद्रिका राय तेज प्रताप के ससुर हैं. तेज प्रताप ने एश्वर्या राय से तलाक़ की अर्जी दे रखी है.
चंद्रिका राय का नाम सार्वजनिक होते ही अफ़वाह उड़ने लगी कि तेज प्रताप सारण अपने ससुर के ख़िलाफ़ निर्दलीय उम्मीदवार को तौर पर चुनाव लड़ेंगे. हालांकि चंद्रिका राय ने बीबीसी से कहा कि उनके दामाद सारण में उनके ख़िलाफ़ चुनाव नहीं लड़ेंगे. बाद में तेज प्रताप ने भी कहा कि कौन कहां से चुनाव लड़ रहा है यह उनकी चिंता नहीं है.
हालांकि तेज प्रताप ने शिवहर और जहानाबाद से दो प्रत्याशियों को उतारा है. शिवहर से आरजेडी ने अभी तक उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है. दोनों भाइयों में मतभेद और विवादों पर तेजस्वी बोलने से बचते हैं. पिछले हफ़्ते शुक्रवार को पत्रकारों ने दोनों भाइयों में कलह पर सवाल पूछा तो तेजस्वी का जवाब था, ''आपको जो कहना है कहिए. इससे मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. आप अपनी टीआरपी के लिए ये सब कर रहे हैं.''
चंद्रिका राय का कहना है कि सब कुछ ठीक हो जाएगा. वो कहते हैं, ''जहानाबाद और शिवहर की सीटों को लेकर भी कोई विवाद नहीं है. सारी चीज़ें कुछ दिनों में ठीक हो जाएंगी. परिवार में विवाद का असर राजनीति पर नहीं पड़ेगा. हम मिलकर काम कर रहे हैं और आगे भी ऐसा ही होगा.''
राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव भी ऐसा ही मानते हैं. उनका भी यही कहना है कि आने वाले कुछ दिनों में सब कुछ ठीक हो जाएगा. तेजप्रताप को स्टार प्रचारक नहीं बनाए पर शक्ति यादव कहते हैं कि यह पार्टी का फ़ैसला है.
तेजस्वी अब लालू प्रसाद यादव के स्वाभाविक उत्तराधिकार के रूप में उभर चुके हैं.
आरजेडी के एक और प्रवक्ता का कहना है कि तेजस्वी के स्वाभाविक उत्तारधिकार के रूप में स्थापित होने से तेज प्रताप सहज नहीं हैं. वो कहते हैं, ''उनके मन में इस बात की कसक है कि वो बड़े हैं इसलिए ये ज़िम्मेदारी उन्हें मिलनी चाहिए थी. लेकिन उनको ये बात भी समझनी चाहिए कि नेतृत्व क्षमता उम्र के आधार पर नहीं आती है. लालू जी ने जो फ़ैसला लिया वो किसी से भेदभाव पूर्ण नहीं था बल्कि विवेकपूर्ण फ़ैसला था.''

Friday, February 22, 2019

محمود أبو زيد - شوكان بانتظار إفراج السلطات المصرية عنه

بدأت السلطات في مصر إجراءات الإفراج عن المصور الصحفي محمود أبوزيد، الشهير بـ"شوكان"، بعد انتهاء عقوبة السجن المفروضة عليه في قضية متعلقة بفض السلطات اعتصاما لأنصار الرئيس السابق محمد مرسي في عام 2013، بحسب مصادر أمنية.
وتشمل الإجراءات الإفراج كذلك عن 214 مسجونا آخرين في القضية المعروفة باسم "فض اعتصام ميدان رابعة العدوية".
وواجه المفرج عنهم اتهامات من السلطات بتنظيم تجمهر مؤلف من أكثر من خمسة أشخاص بمحيط ميدان رابعة العدوية، من شأنه أن يعرض السلم والأمن العام للخطر.
وكان من المقرر إطلاق سراحهم في أغسطس/ آب الماضي، لكنهم لم يتمكنوا من سداد المصاريف الجنائية والتعويضات التي قضي بها عليهم، وبالتالي تم تمديد حبسهم بموجب قرار من النيابة العامة، في ما يسمى بعقوبة الإكراه البدني، والتي امتدت لستة أشهر، انتهت أمس.
وبعد الإفراج عنهم، سيواجهون 3 إجراءات عقابية أخرى، هي: وضعهم تحت مراقبة الشرطة لمدة 5 سنوات، وحرمانهم من إدارة أموالهم وأملاكهم، وعزل من يعمل منهم من وظيفته الحكومية.
يبلغ شوكان من العمر 31 عاما، وهو مصور صحفي اسمه الحقيقي "محمود عبد الشكور أبو زيد"، وقد سُجن على ذمة التحقيق منذ أغسطس/ آب 2013 وأُلقي القبض عليه أثناء القيام بتأدية عمله الصحفي، وفقا لمحامي الدفاع عنه.
وكان شوكان يعمل لحساب وكالة "ديموتيكس" البريطانية عندما تم توقيفه في 14 أغسطس/ آب 2013 أثناء تغطيته فض اعتصام أنصار الرئيس المصري المعزول محمد مرسي في محيط مسجد رابعة العدوية، شرقي القاهرة.
وينتمي لأسرة من محافظة قنا، وعمل مصورا لدى أكثر من وكالة عالمية، والتقط العديد من الصور المهمة، التي جعلته من أهم 200 مصور صحفي حول العالم لدى وكالة "ديموتيكس".
ويقول محمد، الشقيق الأكبر لشوكان، إن محمود عمل مراسلا لصحيفة "الأهرام المسائي" لمدة 6 أشهر قبل أن يبدأ العمل مصورا حرا بوكالة "ديموتيكس" التي خاطبت جهات التحقيق في مصر وأكدت طبيعة عمل شوكان، وأسباب وجوده لحظة فض الأمن ميدان رابعة.
وفي العام الماضي، قررت منظمة التربية والثقافة والعلوم (يونسكو) منحه جائزة حرية الصحافة الدولية المرموقة، التي تحمل اسم "غييرمو كانو".
وقالت رئيسة اللجنة التي تمنح الجائزة ماريا ريسا إن "اختيار محمود أبو زيد جاء تقديرا لشجاعته، ومقاومته والتزامه حرية التعبير".